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चीन के लिए बल्लेबाजी करती इलेक्ट्रॉनिक कंपनियां, ड्रैगन ने कैसे खत्म कर दिया भारत का इलेक्ट्रॉनिक मार्केट?

 

नई दिल्ली, जुलाई 19: आज के जमाने में हर देश अपना निर्यात बढ़ाना चाहते हैं और इलेक्ट्रॉनिक सेक्टर किसी भी देश की निर्यात को बढ़ाने में काफी अहम योगदान देता है, लेकिन भारत की कमजोर मैन्यूफैक्चरिंग की वजह से भारत का निर्यात, आयात के मुकाबले काफी कम रहा है। मोबाइल फोन से लेकर खिलौनों तक और ऑटोमोबाइल सेक्टर से लेकर सेमिकंडक्टर चिप्स तक, हर मैन्यूफैक्चरिंग आइटम में इलेक्ट्रिॉनिक सेक्टर शामिल है। लेकिन, भारतीय इलेक्ट्रॉनिक सेक्टर को ड्रैगन धीरे धीरे मार रहा है।

चीन के लिए बल्लेबाजी

इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माताओं ने भारत सरकार से कहा है, कि वह चीन के छोटे कंपोनेंट निर्माताओं को देश में अपनी दुकान स्थापित करने की अनुमति दे, ताकि मैन्यूफैक्चरिंग इकोसिस्टम को गहरा किया जा सके और भारत को और अधिक प्रतिस्पर्धी बनाया जा सके। इस दिशा में, उन्होंने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) नीति पर सरकार से स्पष्टता मांगी है, क्योंकि एफडीआई को लेकर भारत सरकार के जमीनी सीमा साझा करने वाले देशों के साथ अलग नियम हैं, जिसे भारत सरकार ने खासकर चीन को ध्यान में रखकर बनाया हुआ है। इंडिया सेल्युलर एंड इलेक्ट्रॉनिक्स एसोसिएशन (ICEA) ने 23 जून को प्रधानमंत्री कार्यालय को लिखे एक पत्र में प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजना और अन्य निर्यात प्रोत्साहन योजनाओं सहित विभिन्न कार्यक्रमों के तहत, उद्योग जगत को दी जाने वाली प्रोत्साहन और बकाया राशि का 'तत्काल भुगतान' करने की भी मांग की है।

एफडीआई पर क्लियर हो पॉलिसी
आईसीईए के अध्यक्ष पंकज मोहिंद्रू ने प्रधानमंत्री कार्यालय को जो चिट्ठी लिखी है, उसमें उन्होंने सरकार से कहा है कि, 'भारत सरकार ने एफडीआई को लेकर 2020 में जो प्रेस नोट जारी किया था, उसमें एफडीआई को लेकर जो बातें हैं, उसे स्पष्ट तौर पर पारिभाषित करने की आवश्यकता है, ताकि एक सही इकोसिस्टम बनाने, भारत में विदेशी निवेश लाने, रोजगार पैदा करने, कौशल सुधार की सुविधा विकसित करने और विकास करने में मदद मिले।' उन्होंने कहा कि, वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं (जीवीसी) को उनके पारिस्थितिकी तंत्र के साथ भारत में ट्रांसफर करने के लिए नीति पर स्पष्टता की कमी कंपनी के संचालन और इकोसिस्टम को नुकसान पहुंचा सकती है। आपको बता दें कि, भारत सरकार ने सीमा साझा करने वाले देशों को लेकर 17 अप्रैल 2020 को एक प्रेस नोट जारी करते हुए संशोधित कर दिया था, जिसमें कहा गया था, सीमा साझा करने वाले देश सरकारी मार्ग के जरिए ही भारत में निवेश कर सकते हैं। सरकार ने ये फैसला चीन-भारत तनाव में बीच लिया था, और इसका उद्देश्य चीन में स्थित कंपनियों के निवेश को हतोत्साहित करना था।


कारोबारियों में क्यों है कनफ्यूजन?
दरअसल, भारत सकार ने एफडीआई पर नये नियम तो जारी कर दिए, लेकिन उसी समय स्मार्टफोन और आईटी हार्डवेयर सहित इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण पर भारत की पीएलआई योजनाओं को चीन में स्थित वैश्विक निर्माताओं को आकर्षित करने के लिए डिज़ाइन किया गया था। लेकिन ऐसा होने के लिए, मुख्य रूप से चीन के कंपोनेंट निर्माताओं को भारत में लाना जरूरी है, लेकिन नियमों के मुताबिक ऐसा करना काफी मुश्किल हो रहा है। आईसीईए ने कहा कि, 'तैयार उत्पादों, खास कर आईटी हार्डवेयर के लिए चीन पर भारी निर्भरता को देखते हुए भारत में जीवीसी को गहरा करने के लिए एक ट्रांसफर रूट बनाना जरूरी है और इसके बिना टायर-2 और 3 के निर्माताओं को भारत बुलाए बगैर ये असंभव है'। इसलिए, शार्ट टर्म से लेकर मिड टर्म तक कमें पारिस्थितिकी तंत्र में भागीदारों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए और भारत में ट्रांसफर करने की सुविधा प्रदान की जानी चाहिए'।


भारत क्यों छूट रहा है पीछे?
वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेइडेशन के तहत भारत ने आईटीएम यानि इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एग्रीमेंट साइन किया था, जो भारत के इलेक्ट्रॉनक रास्ते पर सबसे बड़ा विलेन साबित हो रहा है। आईटीए एग्रीमेंट के तहत कंप्युटर, सेमिकंडक्टर्स और उनके कंपोनेंट, डेटा स्टोरेज मीडिया यानि हार्ड डिस्क, टेलिकम्युनिकेशन इक्विपमेंट्स और उनके पार्ट्स शामिल हैं और इस एग्रीमेंट को डब्ल्यूटीए के 82 देश साइन कर चुके हैं, जो इलेक्ट्रॉनिक सेक्टर में 97 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखता है। वहीं, साल 2015 में आईटीए-2 एग्रीमेंट भी डब्ल्यूटीओ की बैठक में लाया गया था, लेकिन भारत ने आईटीए-2 से दूरी बनाए रखी। आईटीएम साइन करने की वजह से ही भारत का सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री आज काफी डेलवप कर चुका है। लेकिन, भारत ने इलेक्ट्रॉनिक सेक्टर के लिए आईटीए से जो उम्मीद लगा रखीं थी, वो असल में भारत के लिए अभिशाप साबित हुआ और इसीलए भारत ने आईटीए-2 यानि आईटीए एक्सपेंशन एग्रीमेंट साइन करने से इनकार कर दिया।


आईटीए से नहीं हो पाया भारत को फायदा
दरअसल, भारत के पास 1990 के दशक में इलेक्ट्रॉनिक टेक्नोलॉडजी नहीं थी और भारत ने इस उम्मीद के साथ आईटीए साइन किया था, कि इससे भारत में इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स का प्रोडक्शन बढ़ेगा और भारत में अपना एक अलग इलेक्ट्रॉनिक सेक्टर का निर्माण हो सकेगा, लेकिन इसका सबसे ज्यादा फायदा चीन ने उठाया, जिसका 2000 में सिर्फ 2 प्रतिशत शेयर था, लेकिन 2011 में बढ़कर 14 प्रतिशत तक पहुंच गया। ऐसा इसलिए, क्योंकि साल 1999 से 2005 के बीच, डब्ल्यूएटीए सचिवालय के आंकड़ों के मुताबिक, भारत के पास सिर्फ 26 पेटेंट्स आए, जबकि चीन ने 206 पेटेंट्स हासिल किए, जो भारत के मुकाबले करीब आठ गुना ज्यादा है। वहीं, आपको जानकर हैरानी होगी, कि 2010 तक आईटी प्रोडक्ट्स के ग्लोबल एक्सपोर्ट्स में भारत की हिस्सेदारी सिर्फ 0.28 प्रतिशत थी, जबकि मैक्सिको के पास ये 2.7 प्रतिशत था, जो आईटीए का हिस्सा भी नहीं है। लिहाजा, भारत को इसका फायदा बिल्कुल नहीं हुआ। और कुछ मुट्ठी भर कंपनियों ने भी विश्व बाजार पर राज करना शुरू कर दिया।


भारत को क्यों हुआ भारी नुकसान?
दरअसल, मुट्ठी भर इलेक्ट्रॉनिक और आईटी कंपनियों ने विश्व बाजार को अपने हाथों में ले लिया और उन्होंने अपने पेटेंट राइट को इंटेलेक्च्वल प्रॉपर्टी लिस्ट में रखकर काफी महंगा बेचना शुरू कर दिया। इसके साथ ही प्रोडक्स की कीमत पर भी इन्हीं कंपनियों का कंट्रोल होने लगा, जिसका सीधा असर विकासशील देशों पर पड़ने लगा और स्थानीय कंपनियां इन बड़ी कंपनियों के प्रोडक्स का किसी भी स्तर पर मुकाबला नहीं कर पाती हैं, लिहाजा सरकार को अपने घरेलू कंपनियों को बढ़ावा देने के लिए भारी सब्सिडी देना पड़ता है। वहीं, ये कंपनियां ग्लोबल प्रोडक्शन लांच करती हैं, यानि पूरी दुनिया के लिए एक ही प्रोडक्ट। जिसका खामियाजा ये होता है, कि स्थानीय लोगों की जरूरतों को बिल्कुल नजरअंदाज कर दिया जाता है और मजबूरन लोगों को वही प्रोडक्ट खरीदना पड़ता है, क्योंकि उनकी जगह कोई और विकल्प नहीं होता है। वहीं, ये कंपनियां कई देशों की सरकारों से भी ज्यादा ताकतवर हो जाती हैं। लिहाजा, इन कंपनियों और विकसित देशों ने भारत जैसे देशों में इलेक्ट्रॉनिक सेक्टर के विकास को काफी ज्यादा मुश्किल बना दिया है।


भारतीय कंपनियां हो गईं गायब
वहीं, आईटीए के नियमों की वजह से और टैरिफ बढ़ने की वजह से भारत में इलेक्ट्रॉनिक मार्केट बन तो नहीं पाया, लेकिन जो चंद कंपनियों ने अच्छा करना भी शुरू किया था, वो बाजार में पूरी तरह से साफ हो गईं और इसका सबसे अच्छा उदाहरण माइक्रोमैक्स और लावा जैसी मोबाइल कंपनियां हैं, जिन्होंने एक वक्त काफी अच्छा व्यापार करना शुरू किया था, लेकिन टेक्नोलॉजी और टैरिफ की जंग ने इन्हें बाजार से उखाड़ फेंका। ऐसा इसलिए, क्योंकि ये कंपनियां बड़ी कंपनियों की टेक्नोलॉजी से टक्कर नहीं ले पाए। वहीं, आईटीए ने कंपोनेंट निर्माण को भी ध्वस्त कर दिया है। वहीं, इलेक्ट्रॉनिक सेक्टर के विकास में काफी पीछे छूटने की कई खामियां भी हो रही हैं, जैसे चीन ने 5जी टेक्नोलॉजी का तेजी से विकास किया है, जो हमारी सुरक्षा के लिए भी एक खतरा है। और यही वजह हैं, कि भारत ने आईटीए-2 साइन नहीं किया है।


भारत सरकार अब क्या कर रही है?
आईटीए-1 के साथ भारत के अनुभव काफी ज्यादा खराब रहे हैं, लिहाजा भारत ने आईटीए से अलग रास्ता बनाते हुए मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर के विकास की योजना बनाई है। भारत को मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने के लिए 'मल्टीटाइल पीएलआई' योजनाएं शुरू की गई हैं। भारत ने मैन्यूफैक्चरिंग को आकर्षक बनाने के लिए भारत को हब बनाने के लिए साल 2026 तक 100 अरब डॉलर की निवेश की योजना बनाई है। वहीं, मोबाइल फोन का निर्माण भारत में हो, इसके लिए 41,000 करोड़ रुपये की पीएलआई योजना में फॉर्म में प्रोत्साहन शामिल हैं।

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