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भारतीय कंपनियों में अब आसान नहीं होंगी चीन और हॉन्गकॉन्ग के नागरिकों की नियुक्तियां!

 


बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की नियुक्तियों पर पड़ेगा सीधा असर. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

नई दिल्ली. भारतीय कंपनियों पर अब चीन का दबदबा नहीं रह जाएगा. केंद्र सरकार ने उन पर शिकंजा कस दिया है. सरकार ने साफ कर दिया है कि चीन और हॉन्गकॉन्ग के नागरिकों की भारतीय कंपनियों में नियुक्ति के लिए अब सुरक्षा मंजूरी लेनी जरूरी होगी.

इन देनों देशों के लोगों के लिए सिक्योरिटी क्लियरेंस लेने की जरूरत संबंधी नोटिफिकेशन 1 जून, 2022 को जारी किया गया है. सरकार की ओर से पहले लगाई गई पाबंदियों का तोड़ निकालने को देखते हुए यह नया कदम उठाया गया है.

मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों पर ज्यादा असर

सरकार के इस ताजा कदम से चीन की उन मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों पर ज्यादा असर होगा, जिनकी भारत में सब्सिडियरी कंपनियां हैं. साथ ही दोनों देशों के वे प्राइवेट इक्विटी या वेंचर फंड भी प्रभावित होंगे, जिन्होंने यहां के स्टार्टअप्स में निवेश कर रखा है. माना जा रहा है कि इसकी जरूरत तब महसूस हुई जब देखा गया कि पड़ोसी देशों से विदेशी निवेश पर अप्रैल, 2020 में लागू पाबंदियों से बचने के लिए चीन और हॉन्गकॉन्ग के निवेशक वैकल्पिक तरीका अपना रहे हैं.

नियुक्ति पर भी पड़ेगा प्रभाव

मनीकंट्रोल ने खेतान एंड कंपनी के मोइन लाढा के हवाले से कहा है कि इस फैसले से निश्चित रूप से सीमावर्ती देशों के निवेशकों की पूर्ण स्वामित्व वाली कंपनियों के मौजूदा प्रबंधन पर असर पड़ेगा. कंपनी बोर्ड में डायरेक्टर्स के रूप में कार्यकाल खत्म होने के बाद विदेशी नागरिकों की फिर से बहाली को लेकर अनिश्चितता पैदा होगी.

सरकार ने नोटिफिकेशन के जरिये कंपनी (अप्वाइंटमेंट एंड क्वालिफिकेशन ऑफ डायरेक्टर्स) एक्ट, 2014 में संशोधन कर दिया है. इसमें कहा गया कि यदि भारत से सटी सीमा के देश का नागरिक भारत में नियुक्ति की मांग करता है तो उसे एक कंसेंट फॉर्म के साथ गृह मंत्रालय से सुरक्षा मंजूरी लेनी होगी. अप्रैल 2020 के दिशा- निर्देशों में भारत के साथ जमीनी सीमा साझा करने वाले देशों से होने वाले विदेशी निवेश के लिए सरकार की मंजूरी अनिवार्य कर दी गई है.

ऐसे निवेश को सुरक्षा मंजूरी देने के मकसद से एक समिति का गठन किया गया था. सीमा पर संघर्ष के बाद चीन से होने वाले निवेश को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाया गया था. कुछ मामलों में देखा गया कि चीन की कंपनी ने अमेरिका या टैक्स हैवन देशों के माध्यम से बिना कोई बंदिशों के निवेश किया.

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