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US recession: मंदी की चपेट में आ सकती है दुनिया की सबसे बड़ी इकॉनमी, मिलने लगे हैं इसके संकेत

 

US recession: मंदी की चपेट में आ सकती है दुनिया की सबसे बड़ी इकॉनमी, मिलने लगे हैं इसके संकेत

नई दिल्ली: दुनिया की सबसे बड़ी इकॉनमी अमेरिका में मंदी (recession) की आहट सुनाई देने लगी है। महंगाई (inflation) चरम पर पहुंच चुकी है, ब्याज दरें (interest rates) बढ़ रही हैं और मकानों की बिक्री लगातार घट रही है। 2022 की पहली तिमाही में अमेरिका की जीडीपी (GDP) में गिरावट आई है। अमेरिकी शेयर बाजार के लिए भी अप्रैल का महीना काफी खराब रहा। नैसडैक (Nasdaq) के लिए अप्रैल का महीना अक्टूबर 2008 के बाद सबसे खराब महीना रहा। एसएंडपी (S&P) के लिए भी यह महीना मार्च 2020 के बाद सबसे बुरा रहा। इससे देश में मंदी (recession) की आशंका और बढ़ गई है। कई जानकारों का कहना है कि ये मंदी के संकेत हैं।

हालांकि कई इकनॉमिस्ट्स का कहना है कि देश में मंदी का तत्काल खतरा नहीं है। मगर लोग इसकी तपिश महसूस करने लगे हैं। गूगल पर मंदी की सर्च में पिछले महीने काफी उछाल देखा गया था। लगातार दो तिमाहियों में इकॉनमी में गिरावट रहती है तो इसे मंदी कहा जाता है। अगर दुनिया की सबसे बड़ी इकॉनमी अमेरिका मंदी की चपेट में आती है तो इसका असर पूरी दुनिया पर देखने को मिल सकता है। साल 2008 में लीमन ब्रदर्स संकट (Lehman Brothers crisis) के कारण मंदी आई थी जबकि मार्च 2020 में कोरोना महामारी (Covid-19 pandemic) की आहट ने दुनियाभर के शेयर बाजारों को धराशायी कर दिया था।

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शेयर बाजार में गिरावट

अप्रैल के आखिरी कारोबारी दिन शुक्रवार को नैसडैक में 4.2 फीसदी गिरावट आई। एएंडपी 500 (S&P 500) में करीब 3.6% गिरावट आई जबकि डाउ (Dow) 940 अंक यानी 2.8% गिर गया। शुक्रवार को ही अमेरिका में महंगाई के भी आंकड़े आए। कोर पर्सनल एक्सपेंडीचर्स प्राइस इंडेक्स एक साल पहले की तुलना में 5.2 फीसदी चढ़ गया। यह अमेरिकी इकॉनमी में संकट का इशारा दे रहा है। रूस और यूक्रेन के बीच चल रही लड़ाई (Russia-Ukraine war) से दुनियाभर में कमोडिटी की कीमतों में काफी तेजी आई है। इससे दूसरी तिमाही में भी कंपनियों का प्रदर्शन प्रभावित हो सकता है।

दूसरी ओर चीन की इकॉनमी भी लड़खड़ा रही है। वहां कोरोना के कारण कई शहरों में लॉकडाउन की स्थिति है। इससे दुनियाभर में सप्लाई चेन प्रभावित हुई है। इससे खासकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर बुरा असर पड़ रहा है। नैसडैक अब मंदड़ियों की चपेट में है और अपने हाई लेवल से 23 फीसदी नीचे आ चुका है। S&P 500 अपने हाई से 13% और Dow अपने रेकॉर्ड हाई से 10% नीचे है। बैंक ऑफ अमेरिका के एनालिस्ट्स ने इस साल के लिए S&P 500 का अनुमान 100 अंक घटाकर 4,500 कर दिया है। उनका कहना है कि इंडेक्स में अभी और 10 फीसदी गिरावट आ सकती है। इससे देश में मंदी की आशंका एक तिहाई बढ़ जाएगी।

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मंदी की आशंका

हालांकि कई अर्थशास्त्रियों का कहना है कि अमेरिका में मंदी की तत्काल आशंका नहीं है। एनबीसी न्यूज के मुताबिक Pantheon Macroeconomics research group में चीफ इकनॉमिस्ट इयान शेफर्डसन ने जीडीपी के आंकड़ों के बारे में एक नोट में कहा कि यह केवल हंगामा है, संकेत नहीं है। इकॉनमी मंदी में नहीं जा रही है। Comerica Bank के चीफ इकनॉमिस्ट बिल एडम्स ने भी इस सहमति जताते हुए कहा कि कंज्यूमर स्पेंडिंग, इनवेस्टमेंट और जॉब ग्रोथ हेल्दी बना हुआ है।

लेकिन कई जानकार मानते हैं कि अमेरिकी इकॉनमी के लिए कई चुनौतियां हैं। फाइनेंशियल सर्विसेज ग्रुप आईएनजी में चीफ इंटरनेशनल इकनॉमिस्ट जेम्स नाइटली ने कहा कि हम ऐसी स्थिति में हैं जहां तेल और खानेपीने के चीजों की बढ़ी कीमत के कारण लोगों की जेब पर दबाव बढ़ गया है और कमाई उस हिसाब से बढ़ नहीं रही है। हाल में आए कंज्यूमर सेंटिमेंट के आंकड़े भी यही बताते हैं कि लोग बढ़ती महंगाई से परेशान हैं। अमेरिका में कई साल से ब्याज दरें काफी कम हैं लेकिन जल्दी ही यह स्थिति बदलने वाली है। फेडरल रिजर्व ने अगले हफ्ते फिर से ब्याज दरों में बढ़ोतरी के संकेत दिए हैं।

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बढ़ सकती है बेरोजगारी

जानकारों का कहना है कि अगर ये संकेत हकीकत में बदलते हैं तो देश में बेरोजगारी बढ़ सकती है और सैलरी बढ़ने की गति धीमी पड़ सकती है। कुछ अर्थशास्त्रियों का कहना है कि देश में महंगाई लंबे समय तक बनी रह सकती है जो पहले ही 40 साल के पीक पर पहुंच चुकी है। बैंक ऑफ अमेरिका ने पिछले हफ्ते अपने क्लाइंट्स को एक नोट में कहा कि मंदी का जोखिम अभी कम है लेकिन 2023 में यह बढ़ सकता है। इसकी वजह यह है कि महंगाई से फेड को ब्याज दर बढ़ाने के लिए मजबूर होना

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