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कटिहार: मक्के की खेती से इस साल किसान कर रहे मोटी कमाई, 2400 से 2500 रुपये प्रति क्‍व‍िंंटल मिल रहा दाम

 


अपनी मेहनत की बदौलत क्षेत्र के किसानों ने केला के बाद अब मक्का की खेती कर अपनी तकदीर ही नहीं बल्कि क्षेत्र की तस्वीर भी बदल रहे हैं। मक्के की अच्छी पैदावार के कारण यह क्षेत्र मक्का का कटोरा बन गया है। वर्तमान में यहां से बड़ी मात्रा में मकई की आपूर्ति बाहर की जा रही है। फलका प्रखंड सहित बरारी, कुर्सेला, कोढ़ा, प्राणपुर, मनसाही आदि प्रखंडों में मकई की फसल लहलहा रही है।

यहां की कुल भूमि में आधे से अधिक पर मकई की खेती की जाती है। मक्के की फसल साल में दो बार लगायी जाती है। लेकिन बड़े पैमाने पर इसकी खेती अक्टूबर से अप्रैल माह में होती है। अक्टूबर से फसल बुआई शुरू होती है एवं मार्च से कटाई शुरू हो जाती है। एक एकड़ में 35 से 40 क्विंटल तक मकई की उपज होती है। कोरोना काल में भाव ठीक नहीं मिला।

लेकिन इस बार बाजार भाव ठीक रहने से मकई की कीमत गेहूं से ज्यादा रही एवं किसानों को खासा मुनाफा भी हुआ है। इस बार भी बड़े पैमाने पर किसानों ने मकई की खेती की। वर्तमान में मक्का 24 -25 सौ रुपये प्रति क्विंटल बिक रही है।

क्या कहते हैं किसान :

युवा किसान अमित कुमार, मो अफरोज आलम, आज़ाद आलम, गुड्डू कुमार, सोनेलाल दास आदि कहते हैं कि मकई की खेती से एक एकड़ में छह माह में 20 से 25 हजार रुपये का मुनाफा आसानी से हो जाता है। लेकिन इस बार भाव अच्छा रहने से आमदनी दोगुनी हुई है। अगर क्षेत्र में मक्का आधारित उद्योग लग जाए तो किसानों की आमदनी में और इजाफा होगा।

क्या कहते हैं व्यवसायी:

व्यवसायी राजेश गुप्ता, टुनटुन कुमार गुप्ता का कहना है कि जिले में मकई की खेती नगदी फसल के रूप में की जाती है। इसका व्यवसाय सालों भर होता है। अगर सरकार मक्का आधारित उद्योग लगाया जाए तो यह क्षेत्र औद्योगिक रूप में विकसित हो जाएगा। साथ ही सरकारी समर्थन मूल्य का निर्धारण हो और मक्का पर आधारित उद्योग लग जाए तो यहां के किसानों की तकदीर बदल सकती है।

क्या कहते हैं जनप्रतिनिधि :-

स्थानीय विधायक कविता पासवान का कहना है कि कटिहार जिला में मकई की अच्छी खेती होती है। इसलिए मक्का आधारित उद्योग यहां लगाने के लिए सरकार से मांग की जाएगी।

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