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6 हजार महीने के लिए वे जिंदगी खपा रहीं… दिल्ली के मुंडका की महिलाओं की दर्दनाक दास्तां

 

6 हजार महीने के लिए वे जिंदगी खपा रहीं… दिल्ली के मुंडका की महिलाओं की दर्दनाक दास्तां

नई दिल्ली : 2010 में पति की मौत के बाद 60 साल की किरण देवी ने मुंडका ने एक जूते-चप्पल बनाने वाली फैक्ट्री में काम करना शुरू किया। उन्हें महीने के सिर्फ 6,000 रुपये सैलरी के रूप में मिलते हैं। ओवरटाइम के साथ उनका वेतन बमुश्किल 8,000 रुपये तक पहुंच जाता है। इतने पैसे में वह मुश्किल से कमरे का किराया और अपने बाकी खर्चों को पूरा कर पाती हैं। यह कहानी सिर्फ किरण की नहीं है, बल्कि किरण जैसी हजारों की संख्या में महिलाओं की भी है, जो मुंडका और आसपास के क्षेत्रों में चलने वाली फैक्ट्रियों में काम करती है। दिन में आठ घंटे से अधिक काम करने के बावजूद महिला कर्मचारियों को बहुत कम पैसे दिए जाते हैं।

महिलाओं की नहीं है स्थायी नौकरी

तीन दिन पहले मुंडका में कंपनी में लगी आग के बाद मरने वाली सबसे अधिक महिलाएं ही थी। मुंडका के भाग्य विहार की कॉलोनी में छोटे-छोटे घरों में 300 महिलाएं रहती हैं। महिला कामगारों के लिए एक और बड़ी समस्या उनकी स्थायी नौकरी न होना है। यदि कंपनियों के पास कम या कोई काम नहीं है, तो वे भुगतान नहीं करती हैं। उनकी फैक्ट्रियों में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं हैं। मुंडका की घटना ने महिलाओं को डरा दिया है, लेकिन उनके पास गुजारा करने के लिए काम करना जारी रखने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

मेरी मां पिछले तीन साल से फैक्ट्री में काम कर रही थी। उसने (मां) यह सुनिश्चित करने के लिए दर्द उठाया कि उसके बच्चे पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करें।

– रिंकी, हादसे में मां को खोया

भूख ना लगे इसलिए अधिक पानी पी लेती हूं

किरण अपने भाई के साथ भाग्य विहार के एक छोटे से कमरे में रहती है। वह अपने 2,000 रुपये के किराए के अलावा बिहार में अपने 18 वर्षीय रिश्तेदार को पढ़ाई के लिए पैसे भी भेजती है। किरण कहती हैं कि जितने पैसे मुझे मिलते हैं उनमें तो मैं बचत के बारे में सोच भी नहीं सकती। उनका कहना है कि हम किसी तरह अपना पेट भर लेते हैं। किरन ने बताया कि कई बार वो अधिक पानी पी लेती हैं जिससे कि भूख कम लगे। बुजुर्ग महिला ने कहा कि इस उम्र में ओवरटाइम करना बहुत मुश्किल होता है। कमरे के किराय में मेरा भाई भी सहयोग करता है।

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66 साल की उम्र, 6500 रुपये तनख्वाह

इसी तरह, 66 साल की मीना देवी राजधानी पार्क में स्टील के बर्तन बनाने वाली फैक्ट्री में 6,500 रुपये महीने पर काम करती हैं। बुजुर्ग महिला के हाथ में चोट के कई निशान हैं, लेकिन वह अपने परिवार का पेट पालने का काम करने को मजबूर हैं। उन्होंने कहा कि मेरे हाथ पर कट के निशान स्टील के बर्तनों के कारण हैं, लेकिन मैं कुछ नहीं कर सकती हूं। बुजुर्ग महिला का कहना है, अगर मैं नियमित रूप से चार घंटे का ओवरटाइम करती हूं तो मुझे 8,000 रुपये मिलते हैं। मीना देवी अपने बेटे, बहू और पोती के साथ रहती है। दो साल पहले उन्होंने अपने पति को खो दिया था। उसके बाद, वह और उनका बेटा दो फैक्ट्रियों में काम करने लगे।

हमें आग लगने की सूचना कंपनी में काम करने वाले किसी अन्य व्यक्ति से मिली। मेरी बहन पिछले दो साल से कंपनी में 7500 रुपये महीना पर काम करती थी।

– कविता, बहन की गई जान

बच्चों की बेहतर जिदंगी के लिए मैंने भी शुरू किया काम

इसी तरह 35 साल की सुनीता नहीं चाहती कि उनके चार बच्चे वहीं जिंदगी जिएं जैसे वो और उनका पति जी रहे हैं। सुनीता बाहरी दिल्ली में एक जूते-चप्पल बनाने वाली फैक्ट्री में काम करती है। सुनीता का कहना है कि मैं और मेरे पति दोनों मिलकर हर महीने 12,000 रुपये कमाते हैं। इतने पैसे में हम छह लोगों का किसी तरह से गुजारा चलता है। उन्होंने कहा कि मैं अपने बच्चों की पढ़ाई रोकना नहीं चाहती। मेरे बच्चे पढ़-लिख कर अपना जीवन बेहतर कर सकेंगे। सुनीता ने बताया कि मेरे पति ज्यादा कमाने में सक्षम नहीं थे, इसलिए मैंने काम करना शुरू कर दिया।

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पति की मौत के बाद करनी पड़ी नौकरी

35 साल की संजीता अपने 16 साल, 10 साल और 13 साल के तीन बच्चों के साथ रहती है। वह पिछले 3-4 साल से एक स्टील फैक्ट्री में काम कर रही है। संजीता का कहना है कि मैं रोज आठ घंटे की शिफ्ट के बाद 11,000 रुपये कमाती हूं। उन्होंने कहा कि मेरे पति की मृत्यु के बाद, मैं बिहार में अपने गांव चली गई थी। अपने बच्चों की बेहतर जिंदगी के लिए मैं उनके साथ तीन-चार साल पहले दिल्ली वापस लौटी। इसके बाद मैंने फैक्ट्री में काम करना शुरू किया।

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लॉकडाउन में खाने के लिए नहीं थे पैसे

महामारी के समय लॉकडाउन के दौरान सभी कारखाने बंद थे। ऐसे में इन महिलाओं के पास खाना खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। वे लोग सुबह घर से सामाजिक संगठनों की तरफ से बांटे जाने वाले भोजन पर ही निर्भर थे।अब जिस तरह से खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़े हैं उससे उनके बजट पर भी असर पड़ा है। संजीता ने कहा कि एक रुपये की भी बढ़ोतरी हमें बुरी तरह प्रभावित करती है।

मुंडका हादसे में मां को खोने का दर्द

मुंडका आग में जान गंवाने वाली एक महिला यशोदा देवी की बेटियों ने कहा कि उनकी मां उनकी पढ़ाई और शादी के लिए ओवरटाइम कर रही थी। यशोदा देवी की बेटी रिंकी ने बताया कि मेरी मां पिछले तीन साल से फैक्ट्री में काम कर रही थी। वह बिना किसी निश्चित घंटे के काम के 7,000-7,500 रुपये कमा रही थी। रिंकी ने कहा कि उसने (मां) यह सुनिश्चित करने के लिए दर्द उठाया कि उसके बच्चे पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करें। यशोदा ने कुछ महीने पहले ही उसने कर्ज लेकर अपने बच्चों के लिए पक्का मकान बनवाया था।

निशा को याद करते हुए नहीं सूख रहे मां के आंसू

यशोदा के घर से चंद मीटर की दूरी पर मीरा देवी अपने घर के बाहर रोती नजर आईं। बड़ी बेटी निशा कुमारी के लापता होने पर उनकी छोटी बेटी कविता सांत्वना दे रही थी। फैक्ट्री के एक अन्य कर्मचारी ने उन्हें आग लगने की सूचना दी थी। सात लोगों के परिवार में निशा अकेली कमाने वाली थी। वे लोग एस्बेस्टस की छत वाले दो छोटे कमरों में रहती हैं। परिजन अभी भी अलग-अलग अस्पतालों में निशा की तलाश कर रहे थे।

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